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ऐलनाबाद में तीनों खेमे “चुनौतियों” से घिरे, अभय के सामने खड़ी हुई ये चुनौतियां

अभय चौटाला के सामने “शिखर” पर बने रहने की चुनौती

गोविंद कांडा के सामने अभय चौटाला को “पकड़ने” की चुनौती

पवन बेनीवाल के सामने कांग्रेस के निशान पर बीजेपी “जैसा” प्रदर्शन करने की चुनौती

कुलदीप श्योराण
ऐलनाबाद। रसूख का सवाल बन चुकी उपचुनाव की जंग में तीनों ही खेमें बड़ी चुनौतियों से “घिरे” हुए हैं। इनेलो, कांग्रेस और बीजेपी-जेजेपी गठबंधन तीनों ही के लिए ही यह उपचुनाव रसूख का सवाल बन गया है। चौटाला परिवार के लिए इस उपचुनाव में रसूख के अलावा अस्तित्व का भी सवाल जुड़ गया है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कुमारी शैलजा के लिए हर हाल में पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन करना जरूरी हो गया है। कांडा परिवार के लिए ऐलनाबाद के घमासान में अपनी उम्मीदवारी को सही साबित करना बड़ी चुनौती बन गया है।

अभय चौटाला के सामने सबसे बड़ी चुनौती…

तीन बार से ऐलनाबाद से विधायक बने आ रहे अभय चौटाला के लिए जीत का चौका जमाने से पहले जीत की “दौड़” में सबसे “आगे” बने रहना सबसे बड़ी चुनौती है।

कांग्रेस और बीजेपी-जेजेपी गठबंधन दोनों ही अभय चौटाला को “पकड़ने” के लिए पूरा दमखम लगाने वाले हैं।

अभय चौटाला इस समय “लीडिंग” पोजीशन पर खड़े हैं। अगले 17 दिनों में अभय चौटाला के लिए सबसे आगे बने रहना किसी चुनौती से कम नहीं है।

जीत के “सिलसिले” को बरकरार रखने के लिए उन्हें ओवर कॉन्फिडेंस का शिकार होने के बजाय पिछली बार से ज्यादा चुनाव को “मैनेज” करने की जरूरत है क्योंकि प्रतिद्वंद्वियों को हल्के में लेना कई बार भारी “नुकसान” का सबब बन जाता है।

कांडा परिवार के लिए झंडा बुलंद करने की चुनौती

ऐलनाबाद के चुनावी दंगल में एकदम “पैराशूट” के जरिए कूदने वाले कांडा परिवार की राह ऐलनाबाद में आसान नहीं है। बीजेपी के झंडे को जीत की प्राचीर पर फहराने के लिए कांडा परिवार को दिन-रात एक करना होगा।

ऐलनाबाद में पिछले दो चुनावों में बीजेपी नंबर दो पर रही है। ऐसे में कांडा परिवार को अपने रसूख को बचाने के लिए हर हाल में नंबर 1 या नंबर 2 पर रहना होगा।

कांडा परिवार ऐलनाबाद ऐलनाबाद की “चढ़ाई” में 23 दिन में शून्य से शिखर पर पहुंचने की चुनौती लेकर चुनावी दंगल में उतरा हैं।

कांडा परिवार ने सिरसा और रानिया के चुनावों में जोरदार सियासी परिणामों के जरिए बड़ा सियासी रसूख हासिल किया है। उसको बनाए रखने के लिए ऐलनाबाद में उपचुनाव में पहले से ज्यादा दमखम लगाना होगा।

पवन बेनीवाल के सामने हाथ के साथ को सही साबित करने की चुनौती

2014 और 2019 के चुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले पवन बेनीवाल इस बार कांग्रेस के सेनापति बने हैं।

शैलजा ने बड़ी उम्मीदों के साथ पवन बेनीवाल को टिकट थमाई है। पवन बेनीवाल के सामने उम्मीदों पर खरा उतरने की बड़ी चुनौती है।

पवन पिछले 2 चुनाव से नंबर दो पर अटके हुए हैं। उनके सामने पिछले दोनों चुनाव के वोटों को “मेंटेन” रखने की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

पवन बेनीवाल को हर हाल में नंबर 1 या नंबर 2 पर ही रहना होगा। अगर वह नंबर 3 पर खिसक गए तो उनके सियासी भविष्य पर सवालिया निशान खड़े हो जाएंगे।

खरी खरी बात यह है कि ऐलनाबाद का उपचुनाव पार्टियों की बजाए “चेहरों” की सियासी “हैसियत” का फैसला करने का काम करेगा।
अभय चौटाला, पवन बेनीवाल और गोविंद कांडा तीनों ही आर-पार के माहौल में चुनाव लड़ रहे हैं।
अभय चौटाला किसी भी कीमत पर हार का “रिस्क” नहीं ले सकते।

अगर वह बड़ी जीत दर्ज करेंगे तो इनेलो नए तेवर के साथ प्रदेश की सियासत में वापसी करेगी। अगर किसी कारण वे उलटफेर का शिकार हो गए तो इनेलो का दरवाजा भी बंद हो सकता है।

अभय चौटाला के साथ में सियासत की बारीकियां सीखने वाले पवन बेनीवाल के लिए ऐलनाबाद का उपचुनाव “मर्सी चांस” कहा जा सकता है। उन्हें कांग्रेस के चुनाव निशान पर पहले से बेहतर प्रदर्शन करके दिखाना होगा।

पवन बेनीवाल के सामने खुद के अलावा कुमारी शैलजा के रसूख को बचाने की भी चुनौती सामने खड़ी है।

सिरसा में बड़ी सियासी ताकत बन चुके कांडा परिवार के लिए ऐलनाबाद का उपचुनाव बड़ी परीक्षा से कम नहीं है।

3 सप्ताह के छोटे से समय में बीजेपी के चुनाव निशान पर बड़ा लक्ष्य हासिल करना कांडा परिवार के लिए “पहाड़” चढ़ने के समान है।

कांडा परिवार ने सिरसा और रानियां में विरोधियों को चौंकाने का काम किया। वही परिणाम ऐलनाबाद में हासिल करने के लिए दोनों भाइयों को जोरदार “बैटिंग” करनी होगी।

तीनों ही सेनाओं के सेनापति बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। जो भी सेनापति बेहतर सियासी चक्रव्यूह रचने में सफल रहेगा वही विरोधियों को मात देने में सफल होगा और खुद सुरक्षित निकलने में कामयाब होगा।

अब देखना यही है कि ऐलनाबाद कख सियासी चक्रव्यूह किन दो योद्धाओं की बली लेता है और किसका राजतिलक करता है।

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